कभी मंदिरों की कला और धार्मिक परंपरा का हिस्सा रहीं महिलाएं, बाद के दौर में कैसे बन गईं शोषण की शिकार?
जानिए देवदासी प्रथा का इतिहास, इसकी शुरुआत, विस्तार, सामाजिक स्वरूप और इसे खत्म करने के लिए
हुए संघर्ष की पूरी कहानी।
विशेष रिपोर्ट
भारत के सामाजिक इतिहास में कुछ ऐसी परंपराएं रही हैं जिनकी शुरुआत धार्मिक और सांस्कृतिक संदर्भों में हुई, लेकिन समय के साथ उनका स्वरूप बदलता गया। देवदासी प्रथा भी ऐसी ही जटिल ऐतिहासिक व्यवस्था थी।
‘देवदासी’ शब्द का सामान्य अर्थ है—देवता की सेविका। परंपरागत रूप से मंदिरों में समर्पित महिलाओं की भूमिका पूजा-अनुष्ठानों, संगीत, नृत्य और मंदिर की सेवा से जुड़ी रही। दक्षिण भारत के कई बड़े मंदिरों में ऐसी महिलाओं के ऐतिहासिक प्रमाण मिलते हैं।
लेकिन सदियों के दौरान इस व्यवस्था का स्वरूप हर जगह एक जैसा नहीं रहा। कुछ क्षेत्रों में धार्मिक और कलात्मक भूमिका धीरे-धीरे सामाजिक, आर्थिक और लैंगिक शोषण से जुड़ गई। गरीब परिवारों की लड़कियों को देवी या देवता को समर्पित करने की परंपरा ने कई जगह उन्हें सामान्य वैवाहिक जीवन से बाहर कर दिया और बाद के दौर में कुछ महिलाएं यौन शोषण तथा वेश्यावृत्ति जैसी परिस्थितियों में पहुंचीं।
इसी विरोधाभास के कारण देवदासी प्रथा का इतिहास केवल धर्म या मंदिरों का इतिहास नहीं है। यह महिलाओं, जाति, गरीबी, कला, सत्ता और सामाजिक सुधार के इतिहास से भी जुड़ा हुआ है।

देवदासी कौन होती थी?
देवदासी वह महिला होती थी जिसे किसी देवी-देवता, मंदिर या धार्मिक संस्था को समर्पित किया जाता था।
कई परंपराओं में समर्पण के बाद उसे देवता की पत्नी या सेविका माना जाता था। इसलिए उसका किसी सामान्य पुरुष से विवाह करना पारंपरिक व्यवस्था के अनुरूप नहीं माना जाता था।
हालांकि पूरे भारत में देवदासी व्यवस्था एक जैसी नहीं थी। अलग-अलग क्षेत्रों में इसके नाम, धार्मिक अनुष्ठान और सामाजिक स्थिति अलग-अलग थीं।
कहीं ये महिलाएं मंदिर की प्रतिष्ठित कलाकार थीं तो कहीं बाद के समय में यही व्यवस्था सामाजिक शोषण का माध्यम बन गई।
इसकी शुरुआत कब हुई?
देवदासी प्रथा की शुरुआत का कोई एक निश्चित वर्ष इतिहास में दर्ज नहीं है।
दक्षिण भारत में इसके प्राचीन और मध्यकालीन स्वरूप के प्रमाण शिलालेखों तथा मंदिरों से मिलते हैं। एक अकादमिक अध्ययन के अनुसार, कर्नाटक में 12वीं शताब्दी से भी पहले के अभिलेखों में ऐसी परंपराओं के प्रमाण मिलते हैं। तंजावुर के राजराजेश्वर मंदिर से जुड़े लगभग 1004 ईस्वी के अभिलेख में करीब 400 देवदासियों का उल्लेख किया गया है। दक्षिण भारत में 10वीं से 13वीं शताब्दी के बीच ऐसे अनेक अभिलेख मिलते हैं।
इससे यह स्पष्ट होता है कि मध्यकालीन दक्षिण भारत में मंदिरों के विस्तार के साथ देवदासी संस्था भी एक संगठित रूप ले चुकी थी।
हालांकि इतिहासकारों के लिए यह भी महत्वपूर्ण है कि प्राचीन मंदिरों से जुड़ी सभी महिला सेविकाओं को आधुनिक अर्थ में ‘देवदासी’ या ‘वेश्या’ मान लेना सही नहीं होगा।

मंदिरों में क्या भूमिका होती थी?
आज देवदासी शब्द सुनते ही अक्सर लोगों के मन में शोषण की तस्वीर आती है। लेकिन इतिहास का शुरुआती हिस्सा इससे अधिक जटिल है।
कई देवदासियां प्रशिक्षित कलाकार होती थीं।
वे—
- मंदिरों में नृत्य करती थीं,
- संगीत और गायन करती थीं,
- धार्मिक उत्सवों में भाग लेती थीं,
- देवी-देवताओं की सेवा से जुड़े कार्य करती थीं,
- मंदिर की सांस्कृतिक परंपराओं को आगे बढ़ाती थीं।
कुछ ऐतिहासिक अध्ययनों के अनुसार दक्षिण भारत में देवदासियों को संगीत और नृत्य की उच्च शिक्षा मिलती थी और उन्हें अपने समय में सामाजिक प्रतिष्ठा भी प्राप्त थी।
यानी देवदासी संस्था के शुरुआती स्वरूप को केवल यौन शोषण की व्यवस्था मानना ऐतिहासिक रूप से अधूरा होगा।
कब बदला इस प्रथा का स्वरूप?
समय के साथ मंदिरों की आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था में परिवर्तन आया। राजाओं और मंदिरों के संरक्षण में बदलाव हुआ और सामाजिक संरचना भी बदलती गई।
इसी दौरान कुछ क्षेत्रों में देवदासी संस्था की धार्मिक भूमिका कमजोर हुई और महिलाओं की आर्थिक निर्भरता बढ़ी।
गरीबी, जातिगत भेदभाव, धार्मिक विश्वास और सामाजिक दबाव ने इस व्यवस्था को और जटिल बनाया।
कई जगह गरीब परिवारों की बेटियों को देवी के नाम पर समर्पित करने की परंपरा विकसित हुई।
यहां से देवदासी व्यवस्था का एक ऐसा रूप सामने आया जिसमें लड़की का सामान्य विवाह नहीं होता था और वह आर्थिक रूप से दूसरे लोगों पर निर्भर हो जाती थी।

लड़की को देवदासी कैसे बनाया जाता था?
क्षेत्र के अनुसार रस्म अलग-अलग होती थी।
कई जगह विशेष धार्मिक समारोह के दौरान लड़की को देवी या देवता को समर्पित किया जाता था।
दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में समर्पण की रस्म को ‘पोट्टुकट्टु’ जैसे नामों से जाना जाता था।
समर्पण के बाद लड़की को धार्मिक रूप से देवी की सेविका माना जाता था।
कई परंपराओं में इसका अर्थ यह भी था कि उसका विवाह किसी सामान्य पुरुष से नहीं होगा, क्योंकि धार्मिक रूप से उसे देवता की पत्नी माना जाता था।
यहीं से उसकी सामान्य वैवाहिक और पारिवारिक जिंदगी दूसरे लोगों से अलग हो जाती थी।
क्या हर देवदासी का यौन शोषण होता था?
इस प्रश्न का उत्तर सावधानी से देना जरूरी है।
हर देवदासी को वेश्या कहना गलत है।
लेकिन यह भी ऐतिहासिक तथ्य है कि बाद के दौर में कुछ क्षेत्रों में देवदासी व्यवस्था महिलाओं के यौन शोषण से जुड़ गई।
राष्ट्रीय महिला आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, कुछ परिस्थितियों में लड़कियों को समर्पित किए जाने के बाद उनका शोषण हुआ और यह व्यवस्था वेश्यावृत्ति से भी जुड़ी।
यानी धार्मिक समर्पण और बाद में होने वाला शोषण हर जगह एक जैसा नहीं था, लेकिन कई क्षेत्रों में दोनों के बीच संबंध स्थापित हो गया।

गरीबी और जाति ने कैसे बढ़ाया संकट?
देवदासी व्यवस्था के बाद के स्वरूप में जाति और गरीबी का प्रभाव बेहद महत्वपूर्ण रहा।
विशेष रूप से कर्नाटक-महाराष्ट्र सीमा क्षेत्र में येल्लम्मा देवी से जुड़ी परंपराओं में वंचित समुदायों की महिलाओं के समर्पण के मामले सामने आए हैं। एक अकादमिक अध्ययन में कर्नाटक के बेलगावी, बीदर, विजयपुरा और कलबुर्गी जैसे क्षेत्रों में इस परंपरा की उपस्थिति का उल्लेख है।
कई परिवारों के सामने आर्थिक संकट था। धार्मिक विश्वासों के साथ यह धारणा भी जुड़ गई कि बेटी को देवी को समर्पित करने से परिवार पर देवी की कृपा होगी या संकट दूर होगा।
इस प्रकार—
गरीबी + सामाजिक दबाव + अंधविश्वास + जातिगत असमानता
ने कई लड़कियों को ऐसी व्यवस्था में पहुंचाया जहां उनके पास अपने जीवन का निर्णय लेने के सीमित विकल्प थे।
येल्लम्मा देवी और देवदासी प्रथा
कर्नाटक और महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में देवदासी परंपरा का संबंध येल्लम्मा या रेणुका देवी से विशेष रूप से रहा है।
सौंदत्ती और उसके आसपास के क्षेत्रों में देवी येल्लम्मा की पूजा से जुड़ी परंपराओं में लड़कियों के समर्पण के मामले लंबे समय तक सामने आते रहे।
अकादमिक अध्ययनों में कर्नाटक, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में इस परंपरा के अलग-अलग रूपों का उल्लेख मिलता है।

किन राज्यों में थी यह प्रथा?
देवदासी परंपरा का इतिहास मुख्य रूप से दक्षिण और पश्चिमी भारत के कई हिस्सों से जुड़ा रहा।
प्रमुख क्षेत्र थे—
कर्नाटक:
विशेषकर उत्तरी कर्नाटक।
महाराष्ट्र:
कर्नाटक सीमा से लगे कुछ क्षेत्र और येल्लम्मा से जुड़े इलाके।
आंध्र प्रदेश और तेलंगाना:
कुछ क्षेत्रों में देवदासी समर्पण की स्थानीय परंपराएं।
तमिलनाडु:
प्राचीन मंदिरों से जुड़ी देवदासी और नृत्य-संगीत परंपरा का महत्वपूर्ण इतिहास।
ओडिशा:
जगन्नाथ मंदिर की ‘महारी’ परंपरा का इतिहास मंदिर-आधारित महिला कलाकारों की परंपरा से जुड़ा रहा है।
इसलिए देवदासी प्रथा को किसी एक राज्य या एक समुदाय तक सीमित करके देखना उचित नहीं है।
देवदासी और भारतीय शास्त्रीय नृत्य
देवदासी इतिहास का एक महत्वपूर्ण और अक्सर भुला दिया जाने वाला हिस्सा भारतीय संगीत और नृत्य से जुड़ा है।
दक्षिण भारत की मंदिर नृत्य परंपराओं में देवदासियों की भूमिका महत्वपूर्ण रही।
वे नृत्य, संगीत और अभिनय की प्रशिक्षित कलाकार थीं।
बाद में जब मंदिर नृत्य परंपराओं का आधुनिक शास्त्रीय नृत्य में पुनर्गठन हुआ, तो देवदासी समुदाय के योगदान पर भी बहस हुई।
विशेष रूप से भरतनाट्यम के इतिहास में देवदासी समुदाय की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
इसलिए देवदासी इतिहास को केवल शोषण के नजरिए से देखना भी अधूरा होगा।

अंग्रेजों के दौर में शुरू हुआ विरोध
19वीं शताब्दी में भारतीय समाज में सामाजिक सुधार आंदोलनों का विस्तार हुआ।
बाल विवाह, सती प्रथा, जातिगत भेदभाव और महिलाओं की स्थिति जैसे मुद्दों पर बहस तेज हुई।
देवदासी व्यवस्था भी इस बहस का हिस्सा बनी।
भारतीय सामाजिक सुधारकों और महिला अधिकार कार्यकर्ताओं ने इसे समाप्त करने की मांग उठाई।
ब्रिटिश प्रशासन के दौरान भी धीरे-धीरे इस पर कानूनी कार्रवाई शुरू हुई।
1924 में भारतीय दंड संहिता में किए गए संशोधन ने नाबालिगों को वेश्यावृत्ति या अवैध यौन संबंधों के लिए इस्तेमाल करने से संबंधित अपराधों को दंडनीय बनाया। हालांकि यह देवदासी प्रथा पर सीधे प्रतिबंध लगाने वाला कानून नहीं था।

मुथुलक्ष्मी रेड्डी का संघर्ष
देवदासी प्रथा के खिलाफ आंदोलन में डॉक्टर मुथुलक्ष्मी रेड्डी का नाम विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
उन्होंने 1930 में मद्रास विधान परिषद में महिलाओं को हिंदू मंदिरों में देवदासी के रूप में समर्पित करने की प्रथा रोकने के लिए विधेयक पेश किया।
इस विधेयक का उद्देश्य देवदासी समर्पण की रस्म को गैरकानूनी बनाना और देवदासियों को सामान्य विवाह का अधिकार देना था। राष्ट्रीय महिला आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, यह विधेयक संशोधनों के बाद लंबे समय तक विचाराधीन रहा और अंततः 1947 में कानून का रूप ले सका।
मुथुलक्ष्मी रेड्डी का संघर्ष
देवदासी प्रथा के खिलाफ आंदोलन में डॉक्टर मुथुलक्ष्मी रेड्डी का नाम विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
उन्होंने 1930 में मद्रास विधान परिषद में महिलाओं को हिंदू मंदिरों में देवदासी के रूप में समर्पित करने की प्रथा रोकने के लिए विधेयक पेश किया।
इस विधेयक का उद्देश्य देवदासी समर्पण की रस्म को गैरकानूनी बनाना और देवदासियों को सामान्य विवाह का अधिकार देना था। राष्ट्रीय महिला आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, यह विधेयक संशोधनों के बाद लंबे समय तक विचाराधीन रहा और अंततः 1947 में कानून का रूप ले सका।
1934: पहला बड़ा कानूनी कदम
देवदासी समर्पण के खिलाफ शुरुआती महत्वपूर्ण कानूनों में Bombay Devadasi Protection Act, 1934 शामिल था।
इस कानून ने महिला को देवदासी के रूप में समर्पित करने की रस्म को गैरकानूनी घोषित किया।
महत्वपूर्ण बात यह थी कि देवदासी का विवाह कानूनी माना गया और उसके बच्चों को वैधता प्रदान की गई।
यह कानून उस समय के सामाजिक ढांचे में एक बड़ा बदलाव था।
1947: मद्रास में बड़ा बदलाव
इसके बाद Madras Devadasis (Prevention of Dedication) Act, 1947 आया।
इसने मंदिरों में महिलाओं को देवदासी के रूप में समर्पित करने की परंपरा पर रोक लगाई।
यह कानून देवदासी व्यवस्था को खत्म करने के लिए दक्षिण भारत में सबसे महत्वपूर्ण कानूनी पड़ावों में से एक था।
1982: कर्नाटक में कानून
कर्नाटक ने Karnataka Devadasis (Prohibition of Dedication) Act, 1982 बनाया।
India Code के अनुसार इसका उद्देश्य राज्य में महिलाओं को देवदासी के रूप में समर्पित किए जाने को रोकना था। यह कानून 11 जनवरी 1984 को अधिनियमित हुआ और 31 जनवरी 1984 से लागू हुआ।
इस कानून ने देवदासी के रूप में समर्पण को गैरकानूनी बनाया।
1988: आंध्र प्रदेश में रोक
Andhra Pradesh Devadasis (Prohibition of Dedication) Act, 1988 31 मार्च 1988 को अधिनियमित हुआ।
इसका सीधा उद्देश्य महिलाओं को देवदासी के रूप में समर्पित किए जाने पर रोक लगाना था।

क्या कानून बनने से प्रथा पूरी तरह खत्म हो गई?
यहीं कहानी का सबसे महत्वपूर्ण सवाल सामने आता है।
कानून बनने के बाद भी कुछ क्षेत्रों में देवदासी परंपरा के अवशेष और गुप्त समर्पण की घटनाओं की रिपोर्टें आती रही हैं।
एक अकादमिक अध्ययन में कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में इस परंपरा के बदलते रूपों का उल्लेख किया गया है।
इसका अर्थ यह नहीं कि आज देवदासी प्रथा खुले तौर पर वैध है। महिलाओं को देवदासी के रूप में समर्पित करना कानूनन प्रतिबंधित है।
समस्या यह है कि कानून किसी सामाजिक विश्वास, गरीबी या अंधविश्वास को एक दिन में समाप्त नहीं कर सकता।
आखिर देवदासी प्रथा की असली कहानी क्या है?
देवदासी प्रथा को समझने के लिए इसे चार अलग-अलग चरणों में देखा जा सकता है—
पहला चरण — धार्मिक और सांस्कृतिक भूमिका
मंदिरों से जुड़ी महिलाएं धार्मिक अनुष्ठानों, संगीत और नृत्य का हिस्सा थीं।
दूसरा चरण — संस्थागत विस्तार
राजाओं और मंदिरों के संरक्षण में यह व्यवस्था दक्षिण भारत में मजबूत हुई।
तीसरा चरण — सामाजिक रूपांतरण
समय के साथ कुछ क्षेत्रों में महिलाओं की स्थिति कमजोर हुई और गरीबी, जाति तथा धार्मिक अंधविश्वास से व्यवस्था जुड़ती गई।
चौथा चरण — शोषण और सुधार
कई स्थानों पर महिलाओं का यौन और आर्थिक शोषण हुआ। इसके खिलाफ सामाजिक आंदोलन चले और अंततः अलग-अलग राज्यों ने कानून बनाकर समर्पण पर रोक लगाई।
देवदासी प्रथा हमें क्या बताती है?
देवदासी प्रथा का इतिहास केवल अतीत की कहानी नहीं है।
यह बताता है कि किसी भी सामाजिक परंपरा का मूल्यांकन केवल उसकी शुरुआत देखकर नहीं किया जा सकता। समय के साथ उसका स्वरूप बदल सकता है।
एक ऐसी व्यवस्था जिसमें कभी महिलाओं को कला और धार्मिक जीवन में विशेष स्थान मिला था, वही व्यवस्था बाद में कुछ क्षेत्रों में महिलाओं के शोषण का माध्यम बन गई।
इस इतिहास में धर्म है, कला है, मंदिर हैं, राजा और सत्ता हैं, जाति है, गरीबी है, महिलाओं का संघर्ष है और सामाजिक सुधार की लंबी लड़ाई भी है।
और शायद सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है—
जब किसी परंपरा के नाम पर किसी लड़की से उसके जीवन का फैसला लेने का अधिकार छीन लिया जाए, तो वह परंपरा कब संस्कृति रहती है और कब शोषण बन जाती है?
देवदासी प्रथा का इतिहास इसी सवाल का एक बेहद जटिल और दर्दनाक जवाब है।
महत्वपूर्ण कानूनी पड़ाव
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1924 | IPC में नाबालिगों को वेश्यावृत्ति/अवैध यौन संबंधों के लिए इस्तेमाल करने से संबंधित प्रावधान मजबूत हुए |
| 1930 | डॉ. मुथुलक्ष्मी रेड्डी ने मद्रास विधान परिषद में देवदासी समर्पण रोकने का विधेयक पेश किया |
| 1934 | Bombay Devadasi Protection Act |
| 1947 | Madras Devadasis (Prevention of Dedication) Act |
| 1982 | Karnataka Devadasis (Prohibition of Dedication) Act |
| 1988 | Andhra Pradesh Devadasis (Prohibition of Dedication) Act |
| 2005 | Maharashtra Devdasi System (Abolition) Act |
| 2008 | महाराष्ट्र का कानून प्रभावी हुआ |
