कोरबा: जिले में PPIUCD घोटाला, अधिकारी जवाबदेही से कन्नी काट रहे हैं?

कोरबा: जिले के लेमरू पंचायत में बड़े लेवल पर PPIUCD घोटाला हो रहा है, यहां स्वास्थ्य कर्मचारियों द्वारा महिलाओं को कॉपर T लगाने के नाम पर बेवकूफ बनाया जा रहा है, लेमरु के आदिवासी व वनांचल निवासियों को ना ही कॉपर T के बारे में कोई खासा जानकारी है ना ही लोगों को PPIUCD किट के बारे में जानकारी है. स्वास्थ्य कर्मचारियों द्वारा किट के नाम पर सरकार से पैसों का आहरण किया जा रहा है, जबकि वास्तविकता में महिलाओं को किट नहीं लगाया गया है.

RTI लगाने पर जवाब नहीं दे पा रहा विभाग.

कोरबा जिले के स्वास्थ्य विभाग से सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत जानकारी चाहि गयी थी कि
1. लेमरु क्षेत्र में कितनी महिलाओं को PPIUCD का लाभ मिला है?
2. कितनी महिलाओं से किट निकाला गया है?
3. किट लगाने वाले कर्मचारियों का विवरण
4. और किट लगवाले / लगाने वालों को मिलने वाली प्रोत्साहन राशि का विवरण प्रदान करें.

लेकिन विभाग द्वारा NHM कर्मचारियों के हड़ताल में होने का हवाला देते हुए जानकारी देने से इनकार कर दिया गया. ऐसे में सवाल यह बनता है कि क्या पूरे कोरबा जिले के स्वास्थ्य विभाग की बागडोर सिर्फ NHM कर्मचारियों के हाथों में है जबकि ये कर्मचारी पूर्ण रुप से सरकारी ओहदे पर भी नहीं हैं? क्या कोरबा जिले के बड़े स्वास्थ्य अधिकारी और कर्चमारियों की कोई जवाबदेही नहीं है कि ये डेली डायरी मेंटेंन करें जबकि यह मुद्दा महिला सुरक्षा से जुड़ा हुआ है.
जब अपीलकर्ता द्वारा अधिकारियों से सवाल पूछा कि जानकारी क्यों नहीं दिया जा रहा है तो जानकारी को निजी बताते हुए कन्नी काटने का प्रयास किया गया.

क्या होता है PPIUCD ?

PPIUCD का पूरा नाम “Postpartum Intrauterine Contraceptive Device” है, जिसे हिंदी में “प्रसवोत्तर अंतर्गर्भाशयी गर्भनिरोधक उपकरण” कहा जाता है। यह एक प्रकार का कॉपर-टी या आईयूसीडी (IUD) है, जिसे प्रसव—यानी डिलीवरी—के तुरंत बाद (अक्सर 48 घंटे के भीतर) या सिजेरियन के दौरान ही गर्भाशय में डाला जाता है। इसका उद्देश्य है महिला को जन्म के तुरंत बाद लंबी अवधि तक सुरक्षित और आसान गर्भ निरोधक सुविधा देना।

PPIUCD के लाभ

  • यह विधि सुरक्षित, बेहद प्रभावी, और किफायती है।
  • लंबे समय तक गर्भ निरोधक सुरक्षा देती है (कॉपर टी 380A लगभग 10 साल तक और 375 मॉडल करीब 5 साल तक)।
  • इसे किसी भी समय, जब परिवार नियोजन की आवश्यकता न हो, आसानी से हटाया जा सकता है और महिला की प्रजनन क्षमता वापस आ जाती है।
  • जब प्रसवोत्तर डाला जाए तो इसकी सुविधा और स्वीकार्यता बढ़ जाती है, क्योंकि उस अवस्था में अस्पताल में ही महिला मौजूद होती है।
  • माँ के स्तनपान पर या शरीर के समग्र स्वास्थ्य पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता।

PPIUCD कैसे काम करता है?

  • यह प्लास्टिक और कॉपर से बना छोटा उपकरण है, जो गर्भाशय में रखा जाता है।
  • यह शुक्राणु और अंडे के मिलने की संभावना को कम करता है, और साथ ही गर्भाशय की दीवार पर निषेचित अंडे के चिपकने से भी रोकता है, जिससे गर्भधारण नहीं होता।

कब और कैसे डाला जाता है?

  • सामान्य तौर पर यह डिलीवरी के 48 घंटे के भीतर या सी-सेक्शन के दौरान डाला जाता है।
  • प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी फॉरसेप्स की मदद से इसे सही जगह स्थापित करते हैं।

PPIUCD उन महिलाओं के लिए खासतौर पर अनुशंसित है, जो प्रसव के तुरंत बाद अगला गर्भ टालना चाहती हैं, और परिवार नियोजन के लिए सरल, सुरक्षित व ऊंची प्रभावशीलता वाली विधि चाहती हैं

कोरबा जिले का लेमरु इलाका आदिवासी और वंचानल निवासियों का ईलाका है, यहां रहने वाली जाति और जनजातियों को खासतौर पर सरकारी नियमों की जानकारी नहीं है ऐसे में पढ़े लिखे कर्मचारी इनके भोलेपन का फायदा उठाकर सरकारी लाभ को अपनी झोली में भर रहे हैं, ये सरकारी कर्मचारी और अधिकारी जनहित के मुद्दों को दरकिनार कर रहे हैं ये ना ही RTI का जवाब दे रहे हैं और ना ही आदिवासी सुरक्षा के लिए उठाए आमजनों के प्रयासों को अहमियत दे रहे हैं.

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