कुंभ मेला भारतीय संस्कृति और धर्म का सबसे बड़ा उत्सव है, जिसे विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक आयोजन माना जाता है। यह न केवल एक आध्यात्मिक यात्रा है, बल्कि भारतीय संस्कृति की जीवंतता और परंपराओं का प्रतीक भी है। कुंभ, महाकुंभ और अर्धकुंभ के बीच अंतर, इसकी मान्यताएं और इसके प्रमुख पहलुओं को जानने के लिए प्रस्तुत हैं 10 मुख्य प्वाइंटर्स:

कुंभ, महाकुंभ और अर्धकुंभ का अंतर:
कुंभ मेला हर 12 साल में एक बार आयोजित होता है। चार पवित्र स्थानों पर इसका आयोजन होता है: हरिद्वार, प्रयागराज (इलाहाबाद), उज्जैन और नासिक।
महाकुंभ 12 कुंभ मेलों के चक्र के बाद यानी 144 वर्षों में एक बार होता है। इसे धार्मिक दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है।
अर्धकुंभ हर 6 साल में हरिद्वार और प्रयागराज में आयोजित होता है। यह कुंभ मेला का छोटा संस्करण है।

कुंभ मेला क्यों होता है:
कुंभ मेला समुद्र मंथन की पौराणिक कथा से जुड़ा है। मान्यता है कि अमृत कलश को ले जाते समय अमृत की कुछ बूंदें हरिद्वार, प्रयागराज, उज्जैन और नासिक में गिरी थीं। इन स्थानों को पवित्र माना जाता है, और यहां कुंभ का आयोजन होता है।
कुंभ के आयोजन स्थल:
हरिद्वार (गंगा नदी):
प्रयागराज (गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम):
उज्जैन (क्षिप्रा नदी):
नासिक (गोदावरी नदी):
कुंभ के पीछे धार्मिक मान्यताएं:

ऐसा माना जाता है कि कुंभ में स्नान करने से पापों से मुक्ति मिलती है और मोक्ष प्राप्त होता है। यह आत्मा की शुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग है।
कुंभ मेला में साधु-संतों का संगम होता है, जो इसे विशेष महत्व देता है।
इस साल का आयोजन:
2025 में महाकुंभ प्रयागराज में आयोजित होगा। यह आयोजन 13 जनवरी 2025 से शुरू होकर 26 फरवरी 2025 तक चलेगा।
अगला महाकुंभ कब होगा:
महाकुंभ हर 144 वर्षों में एक बार होता है, इसलिए अगला महाकुंभ वर्ष 2169 में आयोजित होगा।
साही स्नान का महत्व:
साही स्नान कुंभ मेले का सबसे प्रमुख आयोजन होता है। इसे “राजा स्नान” भी कहा जाता है।
यह स्नान कुंभ के पवित्र दिनों में किया जाता है, जिसे सबसे शुभ माना जाता है।
साही स्नान में कौन-कौन शामिल हो सकता है:
साही स्नान का प्रमुख हिस्सा अखाड़ों के साधु-संत होते हैं।
इसमें नागा साधु, अग्नि अखाड़े के संत, वैष्णव और शैव पंथ के साधु सबसे पहले स्नान करते हैं। आम श्रद्धालु इनके बाद स्नान करते हैं।
साही स्नान का धार्मिक दृष्टिकोण:
यह स्नान अखाड़ों की परंपराओं और अनुशासन का प्रदर्शन है। साधु-संतों के पहले स्नान करने का प्रतीक है कि वे समाज में धर्म और आध्यात्म का मार्ग दिखा रहे हैं।

कुंभ मेले का वैश्विक महत्व:
कुंभ मेला न केवल भारतीयों बल्कि विदेशियों को भी आकर्षित करता है। इसे 2017 में यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर की सूची में शामिल किया गया।
लाखों श्रद्धालु और पर्यटक हर बार इस आयोजन में शामिल होते हैं, जो इसकी विशालता और महत्व को दर्शाता है।
कुंभ, महाकुंभ और अर्धकुंभ न केवल भारतीय धर्म और संस्कृति का हिस्सा हैं, बल्कि यह विश्वभर में भारतीय परंपरा की गहराई और अध्यात्म की महत्ता को दर्शाते हैं। प्रयागराज में होने वाला आगामी महाकुंभ 2025 एक बार फिर से इन पवित्र परंपराओं को जीवंत करेगा।
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