शिक्षा माफिया: RTE के पैसों से मौज उड़ा रहे राजशी पब्लिक HS स्कूल के संचालक, DEO साहब नहीं ले रहे सुध!

“शिक्षा का अधिकार हर बच्चे का जन्मसिद्ध अधिकार है, और इसे कोई नहीं छीन सकता।”
– कैलाश सत्यार्थी

हमारे भारत देश में सालों से एक ही बात पर सबसे ज्यादा बहस छिड़ती रही है कि सभी को समान शिक्षा मिलनी चाहिए, सभी को पढ़ने के लिए एक जैसा माहौल मिलना चाहिए लेकिन कई दशक बीत जाने के बाद भी यह भारत में संभव नहीं हो पाया, यहां आज भी गरीब छात्रों को सही शिक्षा नहीं मिल पा रही है, हर सरकार इसके लिए पंचवर्षीय योजना लागू तो कर देती है लेकिन इसका संचालन सही से चल रहा है या नहीं इस बात को जानने में कभी इंट्रेस्ट नहीं लेती, आज के समय में देश के हर राज्य से शिक्षा व्यवस्था के कमजोर होने की खबर हमें मिलती रहती है लेकिन छत्तीसगढ़ एक ऐसा राज्य है जहां शिक्षा के मुद्दे पर कितनी भी खबर छप जाए यहां के कर्मचारियों और अधिकारियों के कानों में जू तक नहीं रेंगती है, आज के शिक्षा माफिया के एपिसोड में कहानी है जांजगीर चांपा जिले के तनौद का यहां एक प्राइवेट बीते 12 सालों से संचालित है.

स्कूल का नाम है राजशी पब्लिक HS स्कूल, जब आप इस स्कूल में जा कर देखेंगे तो आपको स्कूल जैसा कुछ नजर नहीं आएगा, यहां पर बस टीन टप्परों से सजी कुछ दीवारें नजर आएंगी

जिसमें सीमेंट का लेप तक नहीं चढ़ा है, स्कूल में सुविधा के नाम पर छात्र छात्रों के लिए सही से शौचालय तक की व्यवस्था नहीं है, ना छोटा मोटा पुस्तकालय, ना दिव्यांगों के रैंप, ना खेलने के लिए सही मैदान, यहां पढ़ने वाले बच्चों से लेकर पढ़ाने वाले टीचर भी इन्हीं टीन टप्पर से बनी छत के नीचे अपनी कुछ घंटों की जिम्मेदारी निभा कर चल देते हैं. स्कूल के अंदर जाने पर आपको सफाई और सुविधा के नाम पर सिर्फ और सिर्फ कबाड़ ही नजर आएगा.

जब पगडंडी खबर की टीम स्कूल में गयी और वहां के संचालक BR kewartya से प्राइवेट स्कूल में होने वाली बुनियादी सुविधाओं के बारे में सवाल करने लगी तब संचालक साहब अपनी जिम्मेदारी और सवालों से भागते हुए नजर आए।

साथ ही कुछ दूरी पर जाकर किसी को फोन लगाते भी नजर आए, काफी देर बीत जाने के बाद शायद जब उन्हें फोन वाले कोई सहायता नहीं मिली तो वे अपना पक्ष रखने के लिए तैयार तो हो गए लेकिन किसी नेता की तरह सवालों का गोल- मोल जवाब देने लगे. संचालक साहब के पास मौके पर स्कूल रिकॉर्ड से जुड़े कोई भी दस्तावेज मौजूद नहीं थे, अगर मौजूद रहा भी हो तो टीम पगडंडी को दिखाने में दिलचस्पी नहीं ले रहे थे. जबकि स्कूल से जुड़े मुद्दों की जानकारी एकदम पारदर्शी होनी चाहिए, ये बात उन्हें भी अच्छे से पता है लेकिन उनका ध्यान सिर्फ और सिर्फ दस्तावेजों और ऑडिट रिपोर्ट को छिपाने की ओर था. बैकग्राउंड में संचालक साहब को पिता कहने वाला एक लड़का भी मौजूद था जो उन्हें सवाल पूछ रहे लोगों जल्दी से टरकाने के लिए इशारा करते नजर आया, यहां तक की स्कूल के बाहर स्कूल का नाम तक नहीं लिखा गया है, संचालक साहब के पास मौके पर ना तो मदवार सामग्री की सूची थी, ना विद्यालय से जुड़ा बिजली का बिल, ना 3 वर्ष का सी.ए. ऑडिट रिपोर्ट, ना भवन का नक्सा, ना ही स्कूल संचालन के लिए जरुरी कोई भी प्रारुप/ दस्तावेज? वहां पढ़ाने वालों शिक्षकों की योग्यता सूची तो बहुत दूर की बात थी. उपर से संचालक बी आर केवर्त्य
का कहना था कि “यह स्कूल 12 साल से ऐसे ही चल रहा है, आपको सुविधाओं में क्या कमी नजर आ रही है? स्कूल की स्थिति पहले और भी बदत्तर थी जिसे 12 सालों सुधार कर ऐसा बना गया है”. लेकिन आम लोगों को देखने पर तनौद का यह ढांचा स्कूल जैसा तो बिलकुल नजर नहीं आता.

दरअसल कहानी कुछ और है?
स्कूल शिक्षा का मंदिर है और इस मंदिर के संचालन के लिए सरकार से RTE और स्कूल संचालन नियम के अनुसार मोटी रकम प्रस्तावित की जाती है लेकिन संचालक उन पैसों को स्कूल के विकास में लगाने की जगह अपना और अपने बच्चों के विकास में लगा देते हैं, तनौद का यह स्कूल पिछले 1 दशक से संचालित है, स्कूल संचालन के लिए बाकायदा सरकारी राशि भी इस स्कूल तक पहुंच रही है लेकिन BEO-DEO साहब की पहुंच से दूर होने की वजह से वे नियमत: इस स्कूल की ओर निरीक्षण के लिए नहीं जाते तभी तो खस्ता हाल में भी तनौद का यह स्कूल सैकड़ों छात्रों को सुविधा के नाम पर दरी और चटाई में बैठा कर शिक्षा दे रहा है. यहां पानी पीने के लिए एक चापाकल लगा है जहां बच्चे खुद जाकर हैंडल चला कर पानी पीते हैं,

खेल के मैदान के नाम पर घास फूस से पटा हुआ एक बड़ा सा मैदान है जहां की सफाई भी शायद किसी अधिकारी के आने से पहले कराई जाती होगी. टीम पगडंडी ने पाया कि तनौद का यह राजसी पब्लिक स्कूल सरकारी नियमों को ताक पर रखकर सरकारी/आरटीई के पैसों को पचाने के लिए अपने ही नियम चला रहा है और जनहित के मुद्दों को अपनी मनमानी और अधिकारियों के सपोर्ट से ताक पर रखने की कोशिश में लगा है.

क्या कहाता है RTE का नियम?
शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत स्कूलों को निम्नलिखित सुविधाएं प्रदान करने का प्रावधान है-

बुनियादी ढांचा
कक्षाएं: पर्याप्त संख्या में कक्षाएं, जो बच्चों की संख्या के अनुरूप हों।
शौचालय: लड़के और लड़कियों के लिए अलग-अलग स्वच्छ और उपयोग योग्य शौचालय।
पेयजल: स्कूल में स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता।
खेल का मैदान: बच्चों के शारीरिक विकास के लिए खेल का मैदान या गतिविधि क्षेत्र।
चारदीवारी: सुरक्षा के लिए स्कूल परिसर में चारदीवारी।
पुस्तकालय: गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए पुस्तकालय की सुविधा।
रैंप: दिव्यांग बच्चों के लिए रैंप और अन्य सुविधाएं।

शिक्षक-छात्र अनुपात:
निःशुल्क शिक्षा:
– कोई भी बच्चा वित्तीय बाधाओं के कारण शिक्षा से वंचित नहीं किया जा सकता। स्कूलों को कैपिटेशन शुल्क या प्रवेश के लिए स्क्रीनिंग प्रक्रिया से रोकने का प्रावधान है

– निजी स्कूलों को अपनी 25% सीटें आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) और वंचित समूहों (SC/ST/OBC) के बच्चों के लिए आरक्षित करनी होंगी।
शारीरिक दंड पर प्रतिबंध:**
– स्कूलों में शारीरिक दंड या मानसिक उत्पीड़न पर पूर्ण प्रतिबंध है

स्कूल चलाने के लिए और भी कई सारे नियम हैं जिनका पालन करना अनिवार्य है लेकिन ग्राम तनौद जिला जांजगीर चांपा का यह राजसी पब्लिक स्कूल किसी भी नियम में देखने पर खरा तो नहीं उतरता हां यह बात अलग हो सकती है कि यह स्कूल भी सरकारी कागजों में सारे नियम में खरा उतरता हो?

अब देखना यह है कि इस स्कूल की शिकायत के बाद जांजगीर चांपा जिले के शिक्षा अधिकारी मामलों को कितनी गंभीरता से लेते हैं या आदतानुसार इस मुद्दे को भी ठंडे बस्ते में डाल कर भूल जाते हैं?

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