छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा जिले के तनौद में स्थित राजसी पब्लिक स्कूल शिक्षा के नाम पर एक बदहाल तस्वीर पेश करता है। पिछले 12 वर्षों से संचालित यह स्कूल शिक्षा का मंदिर कम, मुनाफे का अड्डा ज्यादा नजर आता है। टीन-टप्पर की छत, बिना सीमेंट की दीवारें, शौचालय की कमी, न पुस्तकालय,

न दिव्यांगों के लिए रैंप, न ही खेल का मैदान—यह स्कूल RTE (शिक्षा का अधिकार) के नियमों की धज्जियां उड़ा रहा है। फिर भी, सरकारी फंड इस स्कूल तक पहुंच रहे हैं, लेकिन इसका उपयोग स्कूल के विकास में नहीं, बल्कि संचालक बी.आर. केवर्त्य और उनके परिजनों की मौज-मस्ती में हो रहा है।



पगडंडी खबर की टीम ने जब स्कूल का दौरा किया, तो संचालक सवालों से बचते नजर आए। स्कूल के रिकॉर्ड, बिजली बिल, ऑडिट रिपोर्ट, भवन का नक्शा—कुछ भी उपलब्ध नहीं था। संचालक का कहना था, “12 साल से स्कूल ऐसे ही चल रहा है, क्या कमी है?” लेकिन बदहाल ढांचा और सुविधाओं का अभाव उनकी पोल खोलता है। RTE नियमों के अनुसार, स्कूल में स्वच्छ शौचालय, पेयजल, खेल का मैदान, पुस्तकालय और दिव्यांगों के लिए रैंप अनिवार्य हैं, लेकिन यहां कुछ भी नहीं। बच्चे चटाई पर बैठकर पढ़ते हैं, और पानी के लिए हैंडपंप चलाना पड़ता है। शिक्षा विभाग और DEO की उदासीनता इस माफिया को बढ़ावा दे रही है। सरकारी राशि का दुरुपयोग और नियमों की अनदेखी के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं होती। सवाल यह है कि क्या जांजगीर-चांपा के अधिकारी इस मामले को गंभीरता से लेंगे, या इसे ठंडे बस्ते में डाल देंगे? शिक्षा के नाम पर यह लूट कब तक चलेगी?
