सरकारी नौकरी के लालच में मां सहित दो भाईयों ने प्रशासन को लगाया चुना? जमा किए फर्जी दस्तावेज.

एक कहावत है ‘जिनके हाथ में सरकारी लड्डू हो, उनका जीवन भी मिठास में ही गुजरता है’
ये दौर तो उत्तर आधुनिकता है इस दौर में सभी के हाथों में टेक्नोलॉजी जरुर है लेकिन सभी के हाथों में जिंदगी बसर करने के के लिए एक नौकरी नहीं है. समाज में कुछ ऐसे लोग हैं जो सरकारी नौकरी के लिए कड़ी मेहनत करते हैं लेकिन उनकी मेहनत रंग नहीं ला पाती दूसरी तरफ इसी समाज में कुछ ऐसे भी लोग हैं जो दस्तावेजों में फर्जीवाड़ा करके नौकरी हासिल कर लेते हैं और बड़ी ही चालाकी से प्रशासन और सरकार को चुना लगा जाते हैं…
यह खबर एक ऐसे ही परिवार के बारे में है जिन्होंने ने बड़ी ही चालाकी से प्रशासन और सरकार को फर्जी दस्तावेजों के माध्यम से गुमराह कर दिया और सरकारी नौकरी हासिल करके सरकारी मिठास में जीवन निर्वाह कर रहे हैं.

एक सरकारी कर्मचारी थे जिनका नाम था बनवारी लाल, सेवा में रहते हुए 11-05-2018 को इनकी मृत्यु हो गई, पहले ये शिक्षा विभाग में प्रधान पाठक के पद पर पदस्थ थे, इनकी पोस्टिंग करतला तहसील जिला कोरबा के पचपेड़ी के एक स्कूल में थी. सरकारी विभागों का व्यवहारिक नियम है कि सरकारी कर्मचारी की मृत्यु के बाद परिवार को जीवन निर्वाह के लिए अनुकंपा के तहत नौकरी दी जाती है, और कुछ मामलों में पेंशन भी कर्मचारी की पत्नी/ पति को दिया जाता है. अनुकंपा नौकरी लेते वक्त परिवार के उत्तराधिकारियों को सहमति पत्र देना होता है कि उनके घर में किसी की सरकारी नौकरी नहीं है. नौकरी से पूर्व विभाग द्वारा बाकायदा स्टांप पेपर पर लिखवाया जाता है कि घर के अन्य सदस्य किसी एक को नौकरी देने के लिए सहमत हैं और उनके घर में किसी की नौकरी सरकारी नहीं है. यहां भी ऐसा ही हुआ. विभाग द्वारा बनवारी लाल उरांव के परिवार से स्टांप पर सहमति लिखवाया गया साथ में शपथ भी कि उनके घर में कोई सरकारी विभाग में कार्यरत नहीं हैं. यहां भी अनुकंपा नियुक्ति के बाद घर के किसी अन्य सदस्य की सरकारी नौकरी लग जाती है तो कोई समस्या की बात नहीं थी. लेकिन

परिवार द्वारा दिया गया शपथ कि उनके घर में किसी की सरकारी नौकरी नहीं है. हमारे पास और भी सरकारी दस्तावेज हैं जो पब्लिक नहीं किया गया है. समय आने पर प्रशासन के समक्ष साझा किया जाएगा


ये स्टांप देखिए यह बनवारी लाल उरांव (मृतक) की पत्नी चैतिन बाई उरांव उम्र 53 वर्ष द्वारा बनवाया गया था, इसमें चैतिन उरांव के द्वारा होशोहवाश में लिखवाया गया है कि वे अपनी सहमति से अपने पति की जगह अनुकंपा की नौकरी अपने पुत्र को दे रही हैं, चैतिन बाई उरांव और बनवारी लाल के 2 पुत्र हैं, 1. मदन लाल उरांव (तत्कालीक उम्र 30 वर्ष ) 2. रितेश कुमार उरांव (तत्कालीक उम्र 22 वर्ष) स्टांप में सहमति देते वक्त साफ साफ लिखा गया है कि चैतिन बाई उरांव और बनवारी लाल के घर किसी की सरकारी नौकरी अनुकंपा नियुक्ति होने तक नहीं है. इस लिए परिवार ने आपसी सहमति से छोटे बेटे रितेश कुमार उरांव को अनुकंपा नौकरी देने के लिए सरकारी अर्जी लगा दी. नौकरी मिल भी गयी लेकिन कहानी में अब नया मोड़ है.

यह दस्तावेज देखिए जिसमें साफ लिखा नजर आ रहा है कि मदन लाल उरांव पिता बनवारी लाल को शिक्षाकर्मी वर्ग 03 के रूप में उ.मा.शा. कुरदा में पदस्थ किया जाता है यह दस्तावेज सत्र 18-02-2009 में जारी हुआ था. यानी जब बनवारी लाल की मृत्यु हुई थी तब उनके बड़े पुत्र मदन लाल उरांव सरकारी नौकरी में कार्यरत थे. लेकिन स्टांप में शपथ देते वक्त परिवार ने बड़ी चलाकी से इस बात को छिपाते हुए छोटे पुत्र रितेश कुमार का नाम अनुकंपा के लिए आगे कर दिया.

रितेश कुमार उरांव का अनुकंपा नियुक्ति संबंधित दस्तावेज


और फर्जी दस्तावेज के सहारे रितेश सरकारी सेवाओं का लाभ ले रहा है, मां को पेंशन मिल रहा है और बड़े भाई मदनलाल 2009 से सरकारी सेवा कर रहे हैं.

कितना आसान होता है फर्जी दस्तावेजों के माध्यम से प्रशासन और सरकार को गुमराह करना. इस परिवार के द्वारा बड़ी ही चालाकी से शासन को गुमराह कर दिया गया. अब देखते हैं शिकायत के बाद शिक्षाविभाग इस परिवार पर क्या एक्शन लेती है.
पगडंडी खबर की हर कोशिस रहेगी कि सरकार को धोखा देने वालों को खिलाफ गंभीर एक्शन हो.

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