भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC) पत्रकारिता का ककहरा पढ़ाने में देश का अग्रणी संस्थान है। भारत में अपने अल्युम्नाई समूह की मज़बूती के लिए विख्यात संस्थान हज़ारीबाग में अपने अल्युम्नाई की मौत की खबरों को नजरंदाज करता रहा. फिलहाल, मात्र 30 साल के मुकुल तयाल को श्रद्धांजलि दे दी गई है, लेकिन मौत पर सवाल और भी हैं।
विश्वगुरु कौन? अकादमी के बड़े धुरंधर तक्षशिला-नालंदा से लेकर डीयू-जेएनयू के लोकतांत्रिक स्पेस पर कपाल मसाज कर रहे थे। अमेरिकी विश्वविद्यालयों के प्रोफेसर और अल्युम्नाई के मज़बूत संगठनों को भारी सभा में धता बताया जा रहा था। कुछ बोल रहे थे कि हमारे यहाँ स्टूडेंट-फ्रेंडली सरकार है, इसलिए पश्चिम के तौर हमें नागवार हैं।
इतने में एक युवा पेशेवर, जो देश के नामी कॉलेज भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली (IIMC) से साल 2021 से पढ़कर निकला था, उसके देहांत की दुखद घटना सामने आई। सबने निगाहें नीचे कर दीं।
एक अल्युम्नाई बोला, “कैंडल मार्च निकालते हैं!” इतने में आरटीआई की मदद से मौत की असली वजह पता लगाने और सोशल मीडिया पर प्रेशर समूह बनाने जैसे विकल्प सामने आए। जब बात आई कॉर्पोरेट को घेरने की, ठेकेदार की भूमिका जांचने की, कुछ खोजबीन कर मुकुल के परिवार से असलियत जानने की, सभी की लार सूख गई।
नौकरी मिलना, काम में जी-जान झोंकना : सितंबर 2021
पगडंडी खबर की विश्वस्त जानकारी के अनुसार, मुकुल एक बेहद मेहनती और टीमवर्क की भावना से काम करने वाला पेशेवर था। IIMC से अंग्रेज़ी पत्रकारिता में डिप्लोमा हासिल किया, और एडिटिंग और फोटोग्राफी में विशेष रुचि के कारण उसने दिल्ली सरकार के सूचना एवं जनसंपर्क निदेशालय में साथ-साथ इंटर्नशिप भी की। मुकुल ने इसके बाद महारत्न कंपनी NTPC Ltd में बतौर नैगम संचार पदाधिकारी काम करने का अवसर हासिल किया।
एक बड़ी संस्था में नौकरी पाना ज़रूर मुकुल और उसके माता-पिता के लिए बड़ा लम्हा रहा होगा। जिस समय बाज़ार में काम के अनुसार वेतन ना मिल रहा हो, और पत्रकारिता का स्पेस ट्विटर और सोशल मीडिया ने घेर लिया हो, मुकुल का पीएसयू को चुनना कोई चौंकाने वाला फैसला तो नहीं था। जहाँ एक तरफ़ उसे कलम की धार बढ़ानी थी, इस रास्ते में उसे बस अपनी धार को संस्थागत पीआर के रास्ते लाना था। इसमें कुछ भी ग़लत नहीं था – न है, न होता है।
मुकुल का LinkedIn खंगालने पर पता चलता है कि उसने साढ़े तीन साल से भी अधिक समय इस संस्था को दिया। इतना समय किसी संस्था को देने के बाद आप चाहे जिस भी पद पर हों, आपका कद और रुतबा ऊँचा हो ही जाता है। इतने समय में मुकुल ने नैगम संचार के अलावा जनकल्याण और मानव संसाधन से जुड़े पेचीदे काम जैसे कि Crisis Management और Industrial Relations को भी संभाला मुकुल के कार्यभार संभालने के बाद ही हज़ारीबाग में मौजूद NTPC के दोनों महत्वपूर्ण कोयला खनन पट्टे – केरेडारी और चट्टी बारियातू – परिचालन के लिए शुरू किए गए। ज़ाहिर है, मुकुल ने अपना सब कुछ झोंक दिया होगा।
मुकुल का पोस्ट जिसमें वह 3 साल के अनुभवों को साझा कर रहा है।
अपने साथी की हत्या का गवाह होना : मार्च 2025
मुकुल के सोशल मीडिया से मालूम पड़ता है कि उसे NTPC के लिए सेवाएँ प्रदान करने में खासी परेशानी भी नहीं हो रही थी। वह अपने किए काम को अपने टीम के साथियों के साथ तस्वीरों में लगातार साझा करता था, यह जानते हुए भी कि उसकी नियुक्ति अस्थायी है।
फिर 8 मार्च 2025 को खबर आई, केरेडारी में बाइक सवार अज्ञात ने मुकुल के ही वरिष्ठ साथी कुमार गौरव की दिन दहाड़े हत्या कर दी। उस दिन से मुकुल ने सोशल मीडिया पर एक भी पोस्ट नहीं डाला।
सूत्र: NDTV इंडिया
कुमार गौरव मानव संसाधन विभाग में बतौर उप-महाप्रबंधक कार्यरत थे। इतने वरिष्ठ सरकारी कर्मचारी के हत्या हुई तो देश भर में बात फैली। 3-4 दिनों के बाद दबंग अमन साहू, जिसे इस हमले का ज़िम्मेदार बताया जा रहा था, उसे छत्तीसगढ़ के रायपुर से रांची लाते समय पुलिस द्वारा कथित एनकाउंटर में मार गिराया गया।
हो सकता है बात ठंडे बस्ते में चली गई हो। हालांकि, ईटीवी भारत में 12 मार्च को छपी ख़बर के मुताबिक एनटीपीसी केरेडारी के कर्मचारियों ने 3 दिन लगातार कोयला डिस्पैच बंद रखा। तस्वीर में मुकुल को भी देखा जा सकता है।

मुकुल को आप सबसे बाईं ओर, हरी क़मीज़ में देख सकते हैं। सूत्र: ETV भारत
केरेडारी का काला इतिहास – महज़ इत्तेफाक थी मुकुल की मौत?
एनटीपीसी के सूत्रों की मानें तो मुकुल को 30 जून आधी रात 01:50 बजे एनटीपीसी माइनिंग गेस्ट हाउससे राज अस्पताल, रांची ले जाया गया था, जहां उन्हें मृत घोषित किया गया था। वे बीती शाम 06:30 बजे दिल्ली से लौटे थे। वापसी के बाद उन्होंने सांस लेने में तकलीफ की शिकायत की थी।
वजह साफ़ नहीं है, लेकिन केरेडारी का बीते 2 साल का ही इतिहास 4 मौतों का गवाह बन चुका है। गौरतलब है कि ऋत्विक एजेंसी के वरिष्ठ अधिकारी शरद कुमार की भी दो अज्ञात ने मई 2023 में गोली मारकर हत्या कर दी थी। हालांकि, सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्थानीय विश्लेषकों का अनुमान है कि ऋत्विक एजेंसी जैसी ठेकेदार संस्थाओं के अंदरूनी भ्रष्ट अधिकारी ही इस हिंसा में गहरे हाथ रख सकते हैं—जिनकी पहले भी घोटालों में भूमिका उजागर हो चुकी है।
संभव यह भी है कि मुकुल की एनटीपीसी के किसी अधिकारी से बहस हो गई, जिस कारण वे दिल्ली अवकाश पर गए, जिसके बाद वापस लौटने पर उनकी फूड पॉइज़निंग ने हत्या कर दी गई हो। इतनी कम उम्र में अकस्मात देहांत कई प्रश्न खड़े करता है।
- जब मुकुल को ‘सांस में तकलीफ’ हुई तो एनटीपीसी के मानव संसाधन विभाग ने उन्हें तत्काल अस्पताल क्यों नहीं भेजा?
- जब मुकुल यात्रा कर लौट रहे थे तो उनकी हालत सामान्य थी। अचानक ऐसा क्या हुआ कि आधी रात उनका देहांत हो गया?
- यदि मुकुल की मौत प्राकृतिक है तो अभी तक पोस्टमार्टम और पुलिस रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं की गई?
यदि जांच में कड़ियाँ साबित हुईं, तो यह स्पष्ट संकेत होगा कि विकास के नाम पर चल रही खनन परियोजनाओं में कृत्रिम रूप से उत्पन्न अपराध को न सिर्फ बढ़ावा मिला है, बल्कि उसे संरक्षित भी किया जा रहा है।पगडंडी ख़बर इस संकट के समय में मुकुल के परिवार के साथ मजबूती से खड़ा है।
सरकार, ठेकेदार, मजदूर, दबंग – कब और कैसे होगा गुंडागर्दी का अंत?
पिछले 4-5 वर्षों में झारखंड के कोयला खनन क्षेत्रों, विशेषकर हज़ारीबाग, चतरा, केरेडारी और चट्टी बारियातू जैसे इलाकों में जो हिंसा का सिलसिला तेज़ हुआ है, उसने विकास के नाम पर चल रहे इस उद्योग की असली सच्चाई को उजागर कर दिया है। एनटीपीसी जैसी सार्वजनिक कंपनियों के लिए काम कर रहे अधिकारी, खनन ठेकेदार, और यहां तक कि निर्दोष ग्रामीण किसान अब गोलियों के शिकार बन रहे हैं। हाल ही में, माफिया की 5 लाख रुपये की फिरौती की मांग को ठुकराने के बाद बड़कागांव के कोलवर और बैजू नामक निर्दोष किसानों की हत्या कर दी गई थे। इन्हें अज्ञात हमलावरों ने गोलियों से छलनी कर दिया था।
इन घटनाओं का उद्देश्य साफ है—स्थानीय समुदायों में भय और खामोशी फैलाना। कोयला माफिया की यह बर्बरता अब हर उस व्यक्ति को निशाना बना रही है जो उनका विरोध करता है या उनकी राह में अनजाने में भी आता है—चाहे वह एक किसान हो, मजदूर हो या कोई अधिकारी।
कोयला माफिया और उग्रवादी गुटों के बीच चल रही ताकत की इस लड़ाई में सबसे बड़ी कीमत आम जनता चुका रही है। किसी अधिकारी को दिनदहाड़े गोली मार दी जाती है, किसी ठेकेदार से फिरौती मांगी जाती है, तो किसी ग्रामीण को नक्सलियों के शक में पुलिस एनकाउंटर में मार देती है—यह सब अब आम बात हो गई है।
इन झूठे मुठभेड़ों में कई बार वे भी मारे जाते हैं जिनका हिंसा या उग्रवाद से कोई लेना-देना नहीं होता। एक ओर माफिया द्वारा फैलाया गया आतंक है, तो दूसरी ओर पुलिस की कार्यवाही भी कई बार सवालों के घेरे में है। इन खनन परियोजनाओं से मिलने वाले मुनाफे की होड़ में मानवीय मूल्य, कानून का राज और नागरिकों की सुरक्षा कुचल दी गई है।
यह जरूरी है कि सरकार, कंपनियां और स्थानीय प्रशासन मिलकर इस अराजकता पर सख्ती से लगाम लगाएं। जब तक प्रशासनिक जवाबदेही, पारदर्शिता और स्थानीय समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित नहीं होती, तब तक यह खनिज संपदा विकास नहीं बल्कि विनाश का साधन बनी रहेगी। सवाल यह नहीं कि अगला शिकार कौन होगा, सवाल यह है – इस गुंडागर्दी का अंत कब होगा?
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