महाशिवरात्रि महामेला में झूला, सर्कस आकर्षण का केंद्र
कनकी में विगत कई सालों से लगता है मेला, जिले सहित पड़ोसी जिले के श्रद्धालु दर्शन पूजन के लिए आते हैं यहां स्थित कनकेश्वर महादेव का प्राचीनतम मन्दिर, लोगों के धार्मिक आस्था का केंद्र
जाने इसका इतिहास
कनकी:- कोरबा जिले के ग्राम कनकी में कनकेश्वर महादेव मंदिर स्थित है, जिन्हें कनकेश्वरधाम के नाम से भी जाना जाता है। जोकि कोरबा से 20 किलोमीटर की दूरी, बिलासपुर से 70 किलोमीटर की दूरी एवं छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से लगभग 200 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
यहां का कनकेश्वर महादेव मंदिर छत्तीसगढ़ के प्राचीन मंदिरों में से एक है। वहीं इसी मंदिर परिसर में एक और मंदिर है जिन्हें चक्रेश्वर महादेव के नाम से भी जाना जाता है। जिसे घुमाने पर भक्तों की मनोकामना पूर्ण होती है ऐसा माना जाता है। कोरबा जिले के इस पवित्र स्थान पर विगत कई वर्षों से मेला लगता है। महाशिवरात्रि के दिन भारी संख्या में भक्तों का भीड़ रहती है। वहीं सावन महीने में भी भक्त जल लेकर पैदल यात्रा करते बोल बम का उद्घोष हुए कनकेश्वर महादेव का जलाभिषेक करने के लिए आते हैं। कनकेश्वरधाम के नाम से प्रसिद्ध यह मंदिर लोगों के धार्मिक आस्था का केंद्र है। कनकेश्वर महादेव को भुंईफोड़ महादेव के नाम से जाना जाता है।आसपास क्षेत्र सहित जिले एवं दूसरे राज्य के श्रद्धालु भक्त भी कनकेश्वर महादेव के दर्शन पूजन के लिए आते हैं एवं जलाभिषेक करते हैं। कांवड़ियां भक्त कांवड़ में जल लेकर बोल बम का नारा लगाते हुए व कीर्तन भजन करते हुए आते हैं एवं दर्शन लाभ प्राप्त करते हैं। हजारों लोग अपनी मनोकामना पूरी करने कतारबद्ध होकर पूजा अर्चना करते हैं।

जानें इनका इतिहास
जिला कोरबा के ग्राम कनकी में हसदेव नदी के तट पर स्थित कनकेश्वर महादेव का मंदिर कोरबा के जमींदार परिवार द्वारा 200 वर्ष पहले निर्माण करवाया गया था। इस मंदिर पर स्थित स्वयंभू शिवलिंग(भुंईफोड़ महादेव) है जिसकी खोज गांव के ही बैजू नामक चरवाहे ने किया था। इस मंदिर में कनकेश्वर महादेव शिवलिंग सहित प्राचीनतम मूर्तियों का अनोखा संग्रह है। मड़वारानी मंदिर के समीप खुदाई के दौरान पाये गये प्रतिमाओं को इस मंदिर में रखा गया है। वहीं कनकेश्वर मंदिर में एक ऐसा शिवलिंग है जिसे भक्तों के द्वारा चारों दिशाओं में घुमाया जाता है जिन्हें चक्रेश्वर महादेव कहते हैं। अभी इस क्रिया को बंद कर दिया गया है।
कैसे प्रकट हुए भुंईफोड़ महादेव
कनकेश्वर महादेव मंदिर की कथा काफी लोकप्रिय है। किवंदंती है कि प्राचीन समय में इस गांव में बैजू नामक गाय चरवाहा रहा करता था। जो सभी ग्रामवासियों के गाय को चराने का कार्य करता था। जिस स्थान पर कनकेश्वर महादेव स्थित है, उस समय वह स्थान पर घने जंगल हुआ करता था। और उस स्थान पर एक काली गाय प्रतिदिन जाकर दूध गिराया करती थी। रोज दूध गिरने के कारण बैजू को गाय के मालिक से डांट खाना पड़ता था। रोज डांट सुनने के कारण बैजू ने उस गाय पर नजर रखना शुरू किया। बैजू ने एक दिन देखा कि गाय एक छोटे से पत्थर पर दूध गिरा रही थी। जब बैजू वहां गया तब एक पत्थर पर गाय दूध गिरा रही थी। यह दृश्य देखकर बैजू ने गुस्से में दूध गिराती गाय को लाठी से मारना शूरू कर दिया। लेकिन गाय वहां से टसमस नही हुई। जब गाय के थन से पूरा दूध गिर गया तब वह गाय वहां से अपने आप हट गई। वहीं बैजू पत्थर पर लाठी मारने लगा तब वह पत्थर एक छोटे टुकड़े में विभक्त हो गया। उसके बाद उसी रात के समय में बैजू को उस पत्थर के बारे में स्वप्न आता है जिसे पत्थर समझकर उसको हटाने की कोशिश किया था वह आम पत्थर नहीं बल्कि शिवलिंग था। तब बैजू ने सुबह जाकर देखा तो वहां शिवलिंग के साथ चावल के कुछ टुकड़े थे जिसे छत्तीसगढ़ की भाषा में कनकी कहा जाता है। तब बैजू ने सभी गांव वालों को सूचित किया तब से उस स्थान पर कनकेश्वर महादेव मंदिर का निर्माण कर पूजा प्रतिष्ठा प्रारंभ किया गया। जो वर्तमान समय में छत्तीसगढ़ के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है।
महाशिवरात्रि पर कनकेश्वरधाम में मेले का आयोजन होता है। जहां भारी संख्या में भक्तों की भीड़ रहती है। हसदेव नदी से श्रद्धालुगण पैदल यात्रा करते हुए कांवर के माध्यम से जल लेकर भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं। बताया जाता है कि कनकेश्वर महादेव पवित्र पर जल एवं कनकी चांवल चढ़ाने से लोगों की इच्छा अवश्य पूर्ण होती है। वहीं कनकेश्वर महादेव के कारण ही इस गांव का नाम कनकी रखा गया है।